..ये मेरे वतन के लोगों.. शब्दों में गुलामी के जंजीर तोड़ने की ताकत रखते थे कवि प्रदीप

द न्यूज़। देश का स्वतंत्रता दिवस मन रहा हो और, ये मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, गाना का धून सुनाई न दे ऐसा हो नहीं सकता है। ये असंभव बातें हैं। इस गाने के बिना हमारी आजादी अधूरी लगती है। इस देश भक्ति गाने में गुलामी की जंजीर तोड़ आजादी दिलाने की ताकत है।

इस गीत को लिखनेवाले कवि प्रदीप भी अमर हो गए। जब तक सूरज चंद रहेगा। जी हां, कवि प्रदीप का नाम हमेशा याद रहेगा।

कवि प्रदीप का वास्तविक नाम रामचंद्र नारायण द्विवेदी था। इनका जन्म एमपी के उज्जैन जिले में हुआ था। फिल्मी दुनिया मे जब इन्हें 200 रुपये महीने का काम मिला तो ये रामचंन्द्र नारायण द्विवेदी से कवि प्रदीप बन गए।

कवि प्रदीप की देश भक्ति गाने भारत का इतिहास बन गया है। देश में चीन आक्रमण को केंद्र में रखकर ये मेरे वतन गीत की रचना की गई। 26 जनवरी 1963 को इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया। उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ फिल्मी दुनिया की नामी गिरामी हस्तियां मौजूद थी। गाने में इतना दर्द है कि नेहरू जी आने आंख के आंसू नहीं रोक पाए थे। आज भी यदि कोई पूरे गाने को सुन ले तो अपनी आंसू रोक नही पाएगा।

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