आखिर बांकीपुर से प्रशांत किशोर ही क्यों? यही है भाजपा के सबसे मजबूत किले को चुनौती देने का समय

पटना। द न्यूज़। ( ओबैदुर रहमान की विशेष रिपोर्ट )। बिहार की राजनीति में कुछ चुनाव केवल सीट जीतने के लिए नहीं लड़े जाते, बल्कि राजनीति की दिशा बदलने के लिए लड़े जाते हैं। पटना का बैंकिपुर विधानसभा क्षेत्र ऐसा ही एक राजनीतिक रणक्षेत्र बनने जा रहा है। यदि जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर बैंकिपुर उपचुनाव लड़ने का फैसला करते हैं, तो यह केवल भाजपा के खिलाफ चुनाव नहीं होगा, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ संघर्ष होगा जिसने दशकों से बिहार को जाति, दल और चेहरे के इर्द-गिर्द सीमित कर रखा है।बैंकिपुर को भाजपा का सबसे मजबूत शहरी गढ़ माना जाता है। भाजपा के नितिन नवीन 2010 से लगातार इस सीट पर जीत दर्ज करते रहे हैं और 2025 में भी उन्होंने 98,299 वोट लेकर 51,936 वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की। भाजपा का वोट प्रतिशत 62% से अधिक रहा।लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जीत का अंतर ही जनता की संतुष्टि का प्रमाण होता है? यदि ऐसा होता तो पटना की पहली बारिश में सड़कें जलमग्न नहीं होतीं, ट्रैफिक जाम राजधानी की पहचान नहीं बनता और युवाओं का पलायन बिहार का सबसे बड़ा संकट नहीं होता।लेकिन आज भी यहां के नागरिक जिन समस्याओं से जूझ रहे हैं, उनमें शामिल हैं:

  • भीषण ट्रैफिक जाम
  • जलजमाव और खराब ड्रेनेज
  • पार्किंग संकट
  • अव्यवस्थित शहरी विकास
  • बढ़ता प्रदूषण
  • युवाओं के लिए रोजगार का अभाव
  • सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की गिरती स्थिति
    विडंबना यह है कि जिस क्षेत्र ने बिहार को कई मंत्री दिए, उसी क्षेत्र के नागरिक आज भी बुनियादी शहरी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
  • बैंकिपुर परंपरागत रूप से कायस्थ बहुल क्षेत्र माना जाता है और वर्षों से भाजपा को यहां मजबूत सामाजिक समर्थन मिलता रहा है।
  • लेकिन 2026 का बैंकिपुर 2010 का बैंकिपुर नहीं है। पर आज यहां:
  • बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं।
  • नौकरीपेशा मध्यम वर्ग बढ़ा है।
  • किरायेदार और प्रवासी आबादी का विस्तार हुआ है।
  • शिक्षित मतदाताओं की संख्या बढ़ी है।
  • अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी पहले से अधिक है।
    यानी बैंकिपुर अब केवल जातीय गणित से नहीं, बल्कि मुद्दों की राजनीति से भी प्रभावित हो सकता है।

प्रशांत किशोर का राजनीतिक संदेश तीन मुद्दों पर आधारित है:
शिक्षा, रोजगार और बेहतर शासन।बैंकिपुर जैसे शिक्षित और शहरी क्षेत्र में यही मुद्दे सबसे अधिक प्रासंगिक हैं।
यही कारण है कि यदि प्रशांत किशोर यहां चुनाव लड़ते हैं तो यह मुकाबला भाजपा बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि “पुरानी राजनीति बनाम नई राजनीति” का स्वरूप ले सकता है।

2025 में बैंकिपुर में मतदान मात्र लगभग 41 प्रतिशत रहा। यह बिहार के औसत से काफी कम है। पटना के शहरी क्षेत्रों में लगातार कम मतदान यह दर्शाता है कि बड़ी संख्या में नागरिक राजनीतिक विकल्पों से निराश हैं। यह वही वर्ग है जो परिवर्तन चाहता है लेकिन उसे विश्वसनीय विकल्प नहीं दिखता।
प्रशांत किशोर इसी राजनीतिक रिक्तता को भरने का प्रयास कर रहे हैं।
प्रशांत किशोर यदि बैंकिपुर से चुनाव लड़ते हैं तो वे सबसे आसान सीट नहीं, बल्कि सबसे कठिन सीट चुनेंगे।लेकिन इतिहास गवाह है कि परिवर्तन हमेशा वहीं से शुरू होता है जहां व्यवस्था सबसे मजबूत दिखाई देती है। बैंकिपुर की लड़ाई एक सीट की लड़ाई नहीं होगी। यह लड़ाई होगी

सत्ता बनाम व्यवस्था परिवर्तन की।
जाति बनाम शिक्षा की।
राजनीतिक विरासत बनाम जनभागीदारी की।

और शायद पहली बार बिहार की राजधानी यह तय करेगी कि आने वाले दशक की राजनीति का चेहरा कौन होगा पुरानी व्यवस्था या नया विकल्प।