संजय जायसवाल का छलका दर्द। कहा, जदयू नेता अपनी सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ धरना पर बैठे तो सही और हमारे नेता कुछ करे तो ऊपर से प्रेसर

बिहार भाजपा अध्यक्ष डॉ संजय जयसवाल का ब्लॉग: “उपचुनाव के परिणाम पर आत्म-विवेचना की जरूरत”

पटना ( द न्यूज़ / विद्रोही)। गठजोड़ में किस तरह की दिक्कतें होती है। किस तरह दवाब झेलना पड़ता है। गठबंधन में किस तरह कुर्बानी देनी पड़ती है। ये सारा दर्द भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल के ब्लॉग से छलक पड़ा है। उन्होंने हालिया उपचुनाव रिजल्ट की दास्तान बयां की है। एक स्थान पर उन्होंने कहा है कि गोपालगंज में जदयू के पूर्व विधायक सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ धरना देते हैं। यदि ऐसा ही कदम भाजपा के कोई नेता उठाता है तो उस पर करवाई के लिए प्रेसर डाला जाता है।

जायसवाल के शब्दों में, इस चुनाव में हमारे सभी बूथ कार्यकर्ताओं ने काफी मेहनत की है। किशनगंज का सामाजिक समीकरण ही कुछ ऐसा है कि परिणाम हमारे पक्ष में नहीं आ सका। लेकिन इस तथ्य को भली-भांति जानते हुए भी हमारे कार्यकर्ताओं ने इस चुनाव में जो लगन और कर्मठता दिखाई है, उसकी जितनी तारीफ़ की जाए कम होगी। आगामी एक महीने के भीतर अपने सभी कार्यकर्ता बंधुओं और बूथ अध्यक्षों को धन्यवाद देने जरूर किशनगंज जरुर आऊंगा।

साथियों, बिहार में हुआ यह उप-चुनाव हमें अपनी कार्यशैली के बारे में पुनः आकलन करने की जरूरत को बताता है। गौर करें तो आज भी लोकसभा के परिणाम उसी तरह हुए जैसे 4 महीना पहले थे, लेकिन विधानसभा के चुनाव का नतीजे बिल्कुल अलग रहें है। भाजपा की यह खासियत रही है कि हम अपनी हार से भी सीखते हैं और हमारा इतिहास गवाह है कि हर हार के बाद हम और मजबूत हो कर उभरे हैं। भले ही यह मुख्य चुनाव नही थे और इन परिणामों का सरकार पर कोई फर्क भी नही पड़ने वाला, लेकिन फिर भी इस परिणाम को ठंडे बस्ते में डालने की नहीं बल्कि क्या कमी रह गई उसकी समग्र समीक्षा कर, कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है।

बिहार के साथ-साथ उत्तर प्रदेश में भी उपचुनाव हुए थे लेकिन वहां एनडीए 80% सीटें जीतने में सफल हुई। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर बिहार में ऐसा क्या हुआ कि जिनके समय में शाम ढलते ही किसी की घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं होती थी, जिनके शासन की भयावह यादें आज भी लोगों के रोम-रोम में सिहरन पैदा कर देते हैं, वह भी दो स्थानों पर जीत गए!!

हालाँकि पिछले कुछ वर्षों का इतिहास देखें तो उपचुनावों में विपक्षी दलों को कुछ सीटें हर बार मिल जाया करती हैं, लेकिन मुख्य चुनावों में हर बार इन्हें करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है. विशेषज्ञों की माने तो जब लोग यह जान लेते हैं कि उनकी मनपसन्द सरकार पर उपचुनावों के परिणाम का कोई प्रभाव नही पड़ने वाला तब उनके सामने बड़े मुद्दे गौण हो जाते हैं और वह स्थानीय मुद्दों पर अपना मत डालने लगते हैं. इसीलिए कई बार उपचुनावों में कोई अन्य उम्मीदवार जीत जाता है. लेकिन जब भी मुख्य चुनाव होते हैं तो जनता अपने नजरिए को और व्यापक बनाते हुए उसी पार्टी को अपना मत देती है जिसके हाथों में उन्हें अपना भविष्य सुरक्षित लगता है. लेकिन वाजिब तथ्य होने के बावजूद इससे इस उपचुनाव का परिणाम नहीं बदलने वाला और हमें इसकी गहन समीक्षा कर कारणों को ढूंढना होगा, जिससे आगे इस तरह की परिस्थिति आए ही नही.

आज के युवाओं ने 2005 के पहले के हालात को नहीं देखा है। उन्हें यह नहीं पता है कि 15 वर्षों के लालू-राबड़ी शासन के बाद 2005 में बिहार की स्थिति किस कदर बदहाल हो गयी थी, जिस समय अन्य राज आगे बढ़ रहे थे, उस समय इनके कुशासन के कारण बिहार कैसे वापस 1947 यानी आजादी के पहले वाली स्थिति में पहुंच चुका था। लेकिन यह एनडीए सरकार ही थी जिसके काल में बिहार के दिन फिरने शुरू हुए और आज बिहार सबसे तेज विकास दर वाला राज्य बन चुका है। पहले जहां बिहार में होने वाले नरसंहार और अपहरण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनते थे, वहीं आज यहाँ हो रहे विकास कार्य लोगों की जुबान पर रहते हैं। 2005 से पहले जो बिहार मुलभुत सुविधाओं से भी वंचित वहां अब सड़क, बिजली और पानी पहले की तरह चुनावी मुद्दे तक नहीं बन पाते।

यह परिवर्तन हमने ही लाया है और आगे अभी और मुकाम पाने बाकि है।
इस उपचुनाव की चर्चा दरौंदा की जिक्र किए बगैर अधूरी है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि दरौंदा में हुआ विद्रोह महज भाजपा कार्यकर्ताओं का विद्रोह नही था बल्कि भाजपा और जदयू कार्यकर्ताओं का सम्मिलित विद्रोह था। अगर हम बेलहर में समझाने में सफल नहीं होते तो वहां भी कुछ ऐसे ही परिणाम देखने को मिल सकते थे। आज भी गोपालगंज में जदयू के पूर्व विधायक सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ धरने पर बैठते हैं। लेकिन अगर यही कार्य भाजपा के किसी पूर्व विधायक ने किया होता तो मुझ पर उसके निष्कासन का दबाव होता।

याद करें तो 2010 में हुए विधानसभा चुनावों में हम तीन चौथाई से ज्यादा बहुमत प्राप्त करने में सफल हुए थे। इसके अनेकों कारण थे, पर जो सबसे महत्वपूर्ण कारण था उसमें बिहार की कानून व्यवस्था में हुआ अभूतपूर्व सुधार और भाजपा-जदयू के कार्यकर्ताओं के बीच का अद्भुत समन्वय और एकता प्रमुख थे। उस समय बिहार की कानून व्यवस्था पूरे भारत में सर्वश्रेष्ठ मानी जा रही थी और दूसरा भाजपा-जदयू कार्यकर्ताओं के परस्पर सहयोग से प्रत्येक प्रखंड में आम लोगों के शासन-प्रशासन संबंधी काम आसानी से हो जाते थे।

आज हमें इन दोनों मसलों पर आत्म विवेचना की जरूरत है।

अंत में …..
आगामी 5 नवंबर को बापू सभागार में बिहार भाजपा के अभिभावक एवं गुजरात के पूर्व राज्यपाल स्वर्गीय कैलाशपति मिश्र जी की पुण्यतिथि मनाई जाएगी। इसमें भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा जी मुख्य अतिथि हैं। आप सभी कार्यकर्ता इसमें आमंत्रित हैं।

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